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चर्चित उपन्यास ‘हमन हैं इश्क मस्ताना’ के लेखक विमलेश त्रिपाठी से डॉ. शिवानी की बातचीत

हिन्द युग्म से प्रकाशित विमलेश त्रिपाठी का नवीनतम उपन्यास हमन हैं इश्क मस्ताना इन दिनों काफी चर्चे में है। उपन्यास पर पाठकों की राय अलग-अलग है। कुछ लोगों का कहना है कि इस उपन्यास में स्त्री पात्रों के साथ न्याय नहीं किया गया और यह उपन्यास एक पुरूष द्वारा लिखा उपन्यास लगता है। दूसरी ओर कुछ लोग इसकी मनोवैज्ञानिक पड़ताल करना चाहते हैं एवं स्त्री विमर्श के नजरिए से देखने का सुझाव भी दे रहे हैं। जो भी है उपन्यास बहुत रोचक ढंग से लिखा गया है और इसमें कुछ ज्वलंत मुद्दे भी उठाए गए हैं। कुछ प्रश्नों के साथ आज हम युवा कवि एवं कथाकार विमलेश त्रिपाठी के साथ उपस्थित हैं और जानने की कोशिश करते हैं कि अपने उपन्यास के बारे में उनकी अपनी क्या राय है? विमलेश जी आपका उपन्यास काफी चर्चित हो रहा है लेकिन स्त्री पात्रों को लेकर पाठक वर्ग थोड़ा असंतुष्ट -सा लगता है ! क्या यह कुछ निश्चित धारणाओं की प्रतिक्रिया है या वाकई आपको लगता है स्त्री पात्रों के साथ और काम करने की जरुरत थी? देखिए उपन्यास लिखते समय उपन्यासकार यह तय कर के नहीं बैठता है कि किसी के साथ अन्याय करने वाला है – लिखने के क्रम में कई पात्र अपना स्वतंत्र विकास कर लेते हैं और फिर उनपर कथाकार का वश नहीं रह जाता। इस उपन्यास में अनुजा के साथ ऐसा ही हुआ है – अनुजा के चरित्र को उसी तरह उपन्यास में आना था जैसे कि वह आया है। आप देखिए कि उपन्यास में उसका लागातार मौन रहना भी कितना कुछ कह रहा होता है। कई बार जहाँ भाषा चुक जाती है वहाँ मौन बोलता है। अनुजा के चरित्र को इसी तरह से देखा जाय तो बात कुछ समझ में आएगी। उपन्यास आत्मकथात्मक ज्यादा लगता है ! अपने शिल्पगत प्रयोग पर एक लेखक होने के नाते आप क्या कहना चाहेंगे ?
उपन्यास की शैली आत्मकथात्मक जरूर है लेकिन यह आत्मकथा नहीं है। यह जरूर है कि कथाकार अपने आस-पास के अनुभवों से प्रेरित होता है लेकिन जब वह कथा कहने बैठता है तो चीजें बिल्कुल भिन्न हो जाती हैं। जहाँ तक शिल्प की बात है तो पहली कहानी से ही मैंने कथा कहने का अपना एक अलग ढंग विकसित करने की कोशिश की। इस उपन्यास में भी आपको वह खिलंदड़ापन देखने को मिल सकता है। अब आज के समय में बैठटकर मैं प्रेमचंद की शैली में उपन्यास नहीं लिख सकता। सबकी कथा कहने की अलग शैली होती है। मेरी भी अलग है। उपन्यास पढ़ते हुए वह अलहदापन आपको जरूर महसूस होगा। यदि इसे मनोवैज्ञानिक उपन्यास की श्रेणी में रखा जाये तो नरेटर अमरेश विश्वाल के जरिये लेखक एक खास मन:स्थिति से जुझते पुरुष के द्वद्व को रेखांकित करने का प्रयास करता दिखता है ! इस सन्दर्भ में आप कुछ कहना चाहेंगे ? आपने यह सही सवाल उठाया। अमरेश पर ही कथा को केन्द्रित किया जाय तब भी वहाँ आपको मनोविश्लेषण की कई परतें दिखेंगी – अन्य चरित्रों के मनोविज्ञान को भी यहाँ समझने की जरूरत है। मैं तो कहता हूँ कि इस उपन्यास में आई हर स्त्री प्रेम के नए मनौवैज्ञानिक दर्शन को लेकर उपस्थित होती है। लेकिन वहाँ अन्य मनोविज्ञान को भी समझना होगा जो बहुत गहरे कहीं न कहीं अनुस्यूत हैं। दूसरी बात कि मैं इसे खुद मनौवैज्ञानिक उपन्यास घोषित नहीं कर सकता। यह निर्णय तो पाठकों और आलोचकों को ही करने दें। मध्यवर्गीय परिवारों में सम्बन्धों के जो पैमाने विकसित होते रहे हैं यह उपन्यास बहुत हद तक उसे छूता है और इन सम्बन्धों से पैदा हुई जटिलताओं पर संवाद करता है फिर भी 60के दशक के उपन्यासों के मध्यवर्गीय सम्बन्धों और आज के उपन्यासों के मध्यवर्गीय सम्बन्धों में आप क्या अन्तर महसूस करते हैं? देखिए 60 के दशक से हम बहुत आगे चले आए हैं। आज तेजी से फैल रही सूचना क्रान्ति और भूमंडलीकरण ने बहुत चीजें बदल दी हैं। जाहिर है कि आज के मध्यवर्ग का स्वरूप भी पूरी तरह बदल चुका है। बहुत समय तक संयुक्त परिवार को अपनी पीठ पर ढोने वाला यह मध्यवर्ग अब नाभिकीय हो गया है। दूसरी बात यह हुई है कि आज पासी सबसे बड़े मूल्य के रूप में उभर कर आ रहा है। ऐसे में मानवीय संबंध भी और अधिक जटिल हुए हैं। मोहन राकेश के यहाँ जो मध्य वर्ग है वह इस सदी में आकर पूँजी के दबाव और सोशल मिडिया के जाल में फँस चुका है। सोशल मिडिया ने मनुष्यों को जोड़ने का काम किया है तो उसने बहुत कुछ तोड़ा भी है। उस टूटन को भी आप इस उपन्यास में महसूस कर सकते हैं। घर कैसे टूट रहे हैं और इसके टूटने के बीच ‘अंकू’ जैसे शिशुओं पर कितना और कैसा प्रभाव पड़ रहा है उस पर भी बात करने की जरूरत है। आपको क्या लगता है प्रेम जैसे दुरुह विषय पर बात करते हुए कबीर की यह पंक्ति “हमन हैं इश़्क मस्तान” इस उपन्यास में आये प्रेम सम्बन्धों को खोल सकी है? अब यह स्वंय मैं कैसे दावा करूँ? पाठकों की प्रतिक्रियाओं ने तो मुझे बहुत उत्साहित किया है। लेकिन यह जरूर कहूँगा कि उपन्यास को पढ़ते हुए आपको जरूर लगेगा कि इस उपन्यास का कोई और शीर्षक हो ही नहीं सकता था। सेक्सुअल सम्बन्धों के पीछे एक खास तरह की बेचैनी या तलाश पर यह उपन्यास दबी हुई सी बात रखता है तीनों स्त्री पात्रों से दैहिक सम्बन्धों को लेकर पुरुष एक विशेष मन:स्थिति में है इसपर आप कुछ कहना चाहेंगे? दरअसल यह उपन्यास यह बताता है कि अमरेश किसी से प्रेम ही नहीं कर पाया। प्रेम में मिले तिरस्कार ने उसे एक डमी में तब्दील कर दिया है – अगर शिद्दत से वह कुछ चाहता है तो अपने घर को बचाना चाहता है – वह घर जो अब इतिहास की बात हो गई है। लेकिन मैं यह भी दावे के साथ नहीं कह सकता – क्योंकि अमरेश के चरित्र का विकास कुछ ऐसा जटिल हुआ है कि खुद यह लेखक भी सही-सही राय देने से बच रहा है। रही बात सेक्सुअल संबंधों की तो यह उपन्यास पुरानी मान्यताओं पर सख्त उंगली रखता है – इससे कई सवाल भी उठते हैं जिनपर बहस करने की जरूरत है।
क्या आपको लगता है व्यक्तिगत सम्बन्धों पर सोशल साइट्स का प्रभाव एक खतरनाक रुप लेता जा रहा है? या सोशल साइट्स ने सम्बन्धों की एक नयी व्याख्या गढ़ी है ?या फिर यह यथार्थ से दूर कल्पना की दुनिया में जीते हुए पलायनवादी मानसिकता को बढ़ावा है?
देखिए मैं स्पष्ट रूप से कहूँ तो सोशल मिडिया के अपने फायदे और नुकसान हैं। जरूरत इस बात की है कि इसका प्रयोग हम किस उद्देश्य से कर रहे हैं। उपन्यास सोशल मिडिया के बारे में भी बात करता है। लेकिन मैंने यह भी देखा है कि इसी सोशल मिडिया के जरिए कई बिछड़े दोस्त एक हुए हैं लोगों ने शादियाँ तक की हैं लेकिन यह भी एक तथ्य है कि इसने विवाहेत्तर संबंधों को भी बढ़ावा दिया है। उपन्यास पढ़ते हुए आपको जरूर महसूस होगा कि संबंधों के संदर्भ में सोशल मिडिया का मिथक और सच क्या है।

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